Monday, June 28, 2010

हम माओवादियों पर लिखेंगे मिस्टर सी !

Saturday, 15 May 2010 18:39 अजय प्रकाश

गौर से देखिये मिस्टर सी : यह बंदूकों वाले बच्चे कभी बीजापुर ब्लाक के आश्रम में पढ़ने वाले छात्र थे. माओवादियों पर सरकारी कार्रवाई की बौद्धिक स्वीकृति लेने जेएनयू गये चिदंबरम को 5 मई की रात काफी तेज झटका लगा जब छात्रों ने सरकार विरोधी नारे लगाये और भाषण देकर जाते गृहमंत्री की सफेद गाड़ी पर काला झंडा फेंक असहमति को तिखाई से स्पष्ट कर दिया। सफेदी पहनने-ओढ़ने के आदी हमारे गृहमंत्री काले झंडे को देख ऐसे खुन्नस में आये कि अगले ही दिन आव देखा न ताव, देश के सजग नागरिकों पर आतंकी कानून लागू किये जाने का फतवा सुना दिया। गृह मंत्रालय से जारी बयान में कहा गया कि ‘बहुतेरे ऐसे बुद्धिजीवी,एनजीओ या संगठन हैं जो माओवादियों के सीधे प्रचारतंत्र का काम कर रहे हैं। वैसे लोगों और संस्थानों के खिलाफ आतंकवादी संगठनों के खिलाफ बनाये गये ‘आतंकवाद निरोधक गतिविधि कानून (यूएपीए 1967)’के तहत दस साल की कैद और आर्थिक दंड की सजा हो सकती है।’
इस कानून का प्रोमो करते हुए कर्नाटक पुलिस ने कन्नड़ अखबार ‘प्रजा वाणी’ में काम करने वाले राहुल बेलागली को एक माओवादी नेता के साक्षात्कार लिये जाने के अपराध में आरोपित किया है। शिमोगा जिले की पुलिस बेलागली को धमका रही है कि अगर उन्होंने स्रोत का खुलासा नहीं किया तो उनके खिलाफ यूएपीए के तहत कार्यवाही की जायेगी। पुलिस ने बेलागली के अलावा अखबार के एसोसिएट संपादक पदमराज को भी नोटिस जारी कर कहा है कि ‘अगर पुलिसिया जांच में सहयोग नहीं दिया तो इंडियन आम्र्स एक्ट,राष्ट्रीय संपंत्ति की क्षति समेत यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज किया जायेगा।’
बहरहाल, यह तो प्रोमो के दौरान का क्लाइमेक्स भर है। नहीं तो माओवाद प्रभावित राज्यों में लंबे समय से यही हालात बने हुए हैं। ऐसे राज्यों में वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, डॉक्टरों, ट्रेड यूनियन नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से लेकर जिला बदर किये जाने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। इससे जाहिर होता है कि सरकार बिना बोले ही संविधान के उन तमाम बुनियादी सिद्धांतों को लंगोटी बना चुकी है जो हमारे अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए भारतीय कानून संहिता के उपबंधों में दर्ज हैं। इसलिए सरकार का नया शिकार क्षेत्र मेट्रो शहर हैं,जहां माओवाद का कोई असर तो नहीं है,मगर उसे जानने-समझने वालों की एक तादाद है। इस दृष्टि से गृह मंत्रालय का यह हालिया बयान एकदम से कहीं दूसरी ओर इशारा करता है जिसका अंदाजा लगाने में हम चूक रहे हैं।
इसे साजिश न कहा जाये तो और क्या है कि जाने-माने पत्रकार और पीयूडीआर से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा का नाम पहले दिल्ली से गिरफ्तार माओवादी नेता की चार्जशीट में दाखिल किया जाता है,फिर गृह मंत्रालय खबर देता है कि माओवादी क्षेत्रों में प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार जॉन म्रिडल के साथ 15दिनी दौरे पर बस्तर के रास्ते दंतेवाड़ा के जंगलों में गये गौतम नवलखा एक पत्रकार की हैसियत से नहीं,बल्कि विदेशी पत्रकार के कूरियर के तौर पर गये थे। अगर सरकार साबित करने में सफल होती है कि गौतम कूरियर बनकर गये थे,तो उन पर उसी आतंकी कानूनी दायरे में कार्यवाही होगी जो पोटा को हटाये जाने के बाद यूपीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बनाया था। दूसरी घटना लेखिका अरूंधति राय को लेकर हुई। आतंकवाद के खिलाफ छत्तीसगढ़ राज्य के बनाये गये कानून ‘छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम’के तहत राज्य ने प्रायोजित ढंग से छत्तीसगढ़ में अरूंधति पर मुकदमा दायर कराया। इसकी प्रतिक्रिया में अरूंधति ने कहा कि ‘वे हमें गिरफ्तार कर सकते हैं,लेकिन मैं देश छोड़कर नहीं जाऊंगी।’
जाहिर है सरकार की इन गीदड़ भभकियों का न सिर्फ अरूंधति,बल्कि माओवादियों को लेकर सरकार की सैन्य और रणनीतिक गलतियों पर बिना रुके लगातार लिखने वालों पर कोई असर नहीं होना है। लेकिन हमारी चिंता पत्रकारिता के व्यावसायिक दायरे पर चिदंबरम के सीधे शुरू किये गये निर्देशों को लेकर है। पत्रकारिता के व्यावसायिक मानदंडों को तार-तार करने वाली पुलिसिया दबिश का लगातार बढ़ता यह तरीका साफ कर देता है कि गृह मंत्रालय अब हमें एक व्यावसायिक पत्रकार भी नहीं बने रहने देना चाहता, जो कि चैथे स्तंभ का बुनियादी मूल्य है। बेलागली का ताजा मामला समझने के लिए काफी है कि इन प्रत्यक्ष-परोक्ष धमकियों के जरिये हमें भविष्य में मजबूर किया जायेगा कि माओवाद को लेकर गृह मंत्रालय से जारी सरकारी विज्ञप्तियों और बयानों से लेकर मंत्रालय के बाबुओं और अधिकारियों की कानाफूसी को ही हम पत्रकारिता मानें।
वैसे तो पहले से ही जनविरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों-लेखकों को पुलिस और खुफिया ने रडार पर लगा रखा है। मगर मुंह पर जाबी लगाने की हिदायत देता यह बयान तो अब उस व्यापक मीडिया दायरे को अपने चपेट में लेने की फिराक में है,जो सिर्फ अपनी रोटी के लिए खबरों को हासिल करता है। कौन नहीं जानता कि जो भी पत्रकार जिस पार्टी या मसले को कवर करता है वह उससे जुड़े लोगों से बेहतरीन खबरें पाने की चाह में (जो मूलतः व्यावसायिक तरीका है), थोड़ा नजदीक होता है। क्या चिदंबरम यह नहीं जानते कि जिस पार्टी से वह ताल्लुक रखते हैं, वहां जाने वाले कई पत्रकार आज कांग्रेस के नेता हो गये। इससे बड़ी तादात ऐसे पत्रकारों की है जो अघोषित कांग्रेसी हैं। कांग्रेस से उन पत्रकारों का रिश्ता बड़ा साफ है कि उसको माहौल बनाने के लिए अपने पत्रकार चाहिए और उन पत्रकारों को अपने संस्थान में जमे रहने के लिए मालिक और संपादक की निगाह में जरूरत।
माओवाद से जुड़े मुद्दों पर लिखने वाले ज्यादातर पत्रकारों का भी यही रवैया और नजरिया है। दूसरी तरफ मैं यह भी मानता हूं समाज में जो कुछ भी घट रहा है उसके बारे में लिखने, सोचने और करने के बारे में पत्रकार खुद ही सोचता है,जो उसकी वैयक्तिक आजादी भी है। रही बात लिखने और छपने के दौरान उसके माओवाद के प्रति झुकाव, लगाव या जुड़ाव की तो अगर उसे प्रतिबंधित करने की कोई सोच चिदंबरम रखते हैं तो इस मुगालते से बाहर आ जायें। फिर भी अगर सरकार इस मसले पर धमकियों, गिरफ्तारियों, फॉलोअप आदि के रास्ते डंडे के जोर पर निपट लेने के मूड में है, तो करके देख ले।
चिदंबरम साहब आपको बता दें कि हम इस देश की आजीवन जनता हैं और आप पांच साल के मंत्री। हमारे साहस और आपकी ताकत में यही बुनियादी फर्क है। आपको ताकत कॉरपोरेट घराने देते हैं और हमें साहस संघर्षों की उस लंबी परंपरा से मिलती है जहां अन्याय के खिलाफ विद्रोह न्यायसंगत है,का इस्तेमाल मुहावरे जैसा होता है। हमारे बाबा सुनाया करते थे-‘अपराधी से बड़ा गुनहगार अपराध देखने वाला,उससे बड़ा गुनहगार देखकर नजरें हटा लेने वाला और सबसे बड़ा गुनहगार देखकर चुप्पी साध लेने वाला होता है।’ गृहमंत्री, आप चुप्पी साधने के लिए कह रहे हैं जो हो नहीं सकता।
आपको पता नहीं, तब मैं दसवीं का छात्र था जब बाबरी मस्जिद ढहने के जश्न की खुशी को अपने गांव में देखा। पूरा गांव अयोध्या की मस्जिद से उखाड़कर लायी गयी एक ईंट के पीछे पागल हुआ जा रहा था और मैं कुछ न कर सका। उसके बाद जब विश्वविद्यालय आया तो गोधरा-गुजरात होते सुना और नहीं सह पाने की स्थिति में उन खबरों से नजरें हटा लीं। दसवीं में पूरी एक इमारत ढही,विश्वविद्यालय के दौरान पूरा एक समुदाय छिन्न-भिन्न हुआ और अब जबकि मैं समाज को समझने लगा हूं तो आप पूरा एक देश तबाह करने पर आमादा हैं और चाहते हैं कि हम बोलें भी नहीं। यह कैसे संभव हैं!
इससे भी महत्वपूर्ण यह कि आज आप मंत्री बने हैं, कल पता नहीं आपका क्या होगा। लेकिन संघर्षों की कथाएं सुनाने वाले, जीवन में यह बातें लागू कराने वाले लोग तो हमारे घर, स्कूल और समाज के हैं जहां मैंने उंगली थामकर ककहरा सीखा है और आपकी भी जमीन वहीं से देखी है। सच बताऊ गृहमंत्री, हम इन सब जीवन मूल्यों को अगर आपके बूटों-संगिनों के डर से छोड़ भी दें, तो भी नहीं जी पायेंगे। हम जिस समाज में रहते हैं वह इतनी समस्याओं और मजबूरियों से त्रस्त है कि हम किसी एक ऐसे व्यक्ति की बात मान ही नहीं सकते जिसे एक लोकसभा क्षेत्र जीतने के लिए दो बार गणना करानी पड़ती है और तबाही का फैसला देने में चंद सेकेंड।
लेखक अजय प्रकाश हिंदी ब्लाग जनज्वार के माडरेटर हैं.

ंदण्डकारण्य से लौटकर :अरुंधती राय

दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।
दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं।
इंद्रावती नदी के किनारे का इलाका माओवादियों द्वारा नियंत्रित है। पुलिस इस इलाके को ‘पाकिस्तान’ कहती है। यहां गांव खाली हैं, लेकिन जंगल लोगों से अटे पड़े हैं। जिन बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए था, वे जंगलों में भागे फिर रहे हैं। जंगल के खूबसूरत गांवों में कंक्रीट की बनी स्कूली इमारतें या तो उड़ा दी गयी हैं और उनका मलबा बचा हुआ है, या फिर इनमें पुलिस वाले भरे हुए हैं। इस जंगल में जो युद्ध करवट ले रहा है, भारत सरकार को उस पर गर्व भी है और कुछ संकोच भी। ऑपरेशन ग्रीनहंट भारत के गृहमंत्री (और इस युद्ध के सीईओ) पी चिदंबरम के लिए अगर गर्वोक्ति है, तो एक इनकार भी। वह कहते हैं कि ऐसा कोई युद्ध नहीं चल रहा, यह सिर्फ मीडिया द्वारा गढ़ा गया है। और इसके बावजूद ढेर सारा पैसा इस युद्ध में झोंका जा रहा है, दसियों हजार सैन्य टुकड़ियों को तैनात कर दिया गया है। भले ही, युद्ध भूमि मध्य भारत के जंगल हैं तो क्या हुआ, इसके गंभीर नतीजे हम सभी के लिए होंगे।
एक उदार चेतन मस्तिष्क के लिए यह मान लेना आसान है कि यह युद्ध भारत सरकार और उन माओवादियों के बीच है जो चुनावों को ढोंग और संसद को सुअरबाड़ा कहते हैं; जिन्होंने भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकने की अपनी मंशा खुलेआम जाहिर कर दी है। उनके लिए यह भुला देना आसान है और सुविधाजनक भी कि मध्य भारत के आदिवासियों के प्रतिरोध का इतिहास माओ से भी सदियों पुराना है (यही सचाई भी है, क्योंकि यदि उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया होता, तो वे बचे ही नहीं होते)। हो, उरांव, कोल, संथाल, मुंडा, गोंड आदिवासियों ने एक नहीं, कई बार विद्रोह किया है, कभी अंग्रेजों के खिलाफ तो कभी जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ। इनकी बगावत को बर्बर तरीकों से कुचल दिया गया, हजारों आदिवासियों को मार दिया गया, इसके बावजूद इन लोगों को जीता नहीं जा सका। यहां तक कि आजादी के बाद पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए पहले जन उभार – जिसे हम माओवादी कह सकते हैं – के केंद्र में भी आदिवासी ही थे (जहां से नक्सलवादी नाम का शब्द पैदा हुआ, आजकल जिसे माओवादी के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है)। तब से लेकर अब तक नक्सली राजनीति अभिन्न रूप से आदिवासी उभार के साथ जुड़ी हुई है, जो हमें जितना नक्सलवादियों के बारे में बताती है, उतना ही वह आदिवासियों से भी सरोकार रखती है।
बगावत की यह विरासत अपने पीछे ऐसे असंतुष्ट और रुष्ट लोगों को छोड़ गयी है जिन्हें जान-बूझ कर भारत सरकार ने हाशिये पर धकेल दिया है और अलग-थलग छोड़े हुए है। भारतीय लोकतंत्र का नैतिक दस्तावेज यानी भारत का संविधान संसद द्वारा 1950 में अपनाया गया था। आदिवासियों के लिए यह एक त्रासदी का दिन था। संविधान ने औपनिवेशिक नीति को सही ठहराते हुए आदिवासी इलाकों का जिम्मा भारतीय राजसत्ता के हाथ में दे दिया। रातों-रात समूची आदिवासी आबादी अपनी ही जमीन पर गैर-कानूनी प्रवासियों में तब्दील हो गयी। इस संविधान ने वनोत्पादों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को ही अस्वीकार कर दिया और इस तरह उनकी समूची जीवन पद्धति को आपराधिक करार दिया। वोट देने के अधिकार के बदले संविधान ने आजीविका और आत्मसम्मान के उनके अधिकार को ही छीन लिया।
सरकार ने पहले तो उनसे सब कुछ छीन लिया और उन्हें गरीबी के कुएं में धकेल दिया। इसके बाद वह उनकी गरीबी को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने में लग गयी। हर बार जब उसे बड़ी आबादी को विस्थापित करने की जरूरत पड़ती – बांधों, सिंचाई परियोजनाओं, खनन आदि के लिए – तो सरकार अचानक ‘आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने’ या उन्हें ‘आधुनिक विकास का फल देने’ की बात करने लग जाती। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की ‘प्रगति’ के शरणार्थी यानी आंतरिक रूप से विस्थापित करोड़ों लोगों (बड़े बांधों से अकेले तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित) में अधिसंख्य आदिवासी लोग ही हैं। जाहिर है जब यह सरकार आदिवासियों के कल्याण की बात शुरू करे, तो वह चिंता करने का वक्त होता है।
इस कड़ी में सबसे हालिया चिंता के स्वर गृहमंत्री पी चिदंबरम की ओर से आये हैं। उन्होंने कहा है कि वह नहीं चाहते कि आदिवासी ‘संग्रहालयी संस्कृति’ का हिस्सा रहें। जब वह एक कॉरपोरेट वकील के अपने करियर में तमाम प्रमुख खनन कंपनियों के हितों को आवाज दे रहे थे, तब तो आदिवासियों का कल्याण उनकी प्राथमिकताओं में ऐसे नहीं आता था। इसलिए जरूरी है कि उनकी इस नयी उत्तेजना के आधार को टटोला जाए।
पिछले तकरीबन पांच साल के दौरान छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। इन्हें हरे नोटों में बदलने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को इन इलाकों से खत्म कर दिया जाए।
यह युद्ध, इसी के लिए है।
मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह ऊंघते हुए बोली, ‘मैं सोच रही थी, कि इस देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है।’
रायपुर से दंतेवाड़ा तक का सफर करीब दस घंटे का है। इसमें उन इलाकों से होकर गुजरना पड़ता है, जिन्हें ‘माओवादी संक्रमित’ कहा जाता है। ऐसे शब्द बेवजह नहीं बनाये गये। संक्रमण/संक्रमित जैसे शब्द बीमारी या कीटों के लिए इस्तेमाल में आते हैं। और बीमारियों को दूर किया ही जाना चाहिए। कीटों को खत्म करना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही माओवादियों को साफ किया ही जाना होगा। बड़े चुपके से और अदृश्य तरीकों से नरसंहार की यह भाषा हमारी शब्दावली का हिस्सा बन चुकी है।
राजमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा बलों ने दोनों ओर जंगलों की एक संकरी पट्टी को घेरा हुआ है। इसके पार ‘दादा लोगों’ का राज है यानी भाइयों का, कॉमरेडों का राज।
रायपुर के बाहरी इलाके में एक विशाल बिलबोर्ड पर वेदांता के कैंसर अस्पताल का विज्ञापन लगा है (वही कंपनी, जिसमें कभी हमारे गृहमंत्री नौकरी करते थे)। उड़ीसा में, जहां वेदांता बॉक्साइट का खनन कर रही है, वह एक विश्वविद्यालय भी बना रही है। ऐसे ही चुपके से और अदृश्य तरीकों से खनन निगम हमारी कल्पनाओं में प्रवेश कर जाते हैं ऐसी उदार ताकतों के रूप में, जो वास्तव में हमारा ख्याल रखते हों। कर्नाटक की हालिया लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक एक निजी कंपनी द्वारा खोदे गये एक टन लौह अयस्क के लिए सरकार को 27 रुपये की रॉयल्टी मिलती है और खनन कंपनी 5000 रुपये बनाती है। बॉक्साइट और अल्युमीनियम के क्षेत्र में तो हालत और भी बुरी है। ये अरबों डॉलर की दिनदहाड़े लूट की दास्तानें हैं। इतना तो चुनावों, सरकारों, जजों, अखबारों, टीवी चैनलों, एनजीओ और अनुदान एजेंसियों को खरीद लेने के लिए काफी है। ऐसे में यहां-वहां एकाध कैंसर अस्पताल बनवा देने में क्या जाता है?
मुझे याद नहीं कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दस्तखत किये गये समझौतों की लंबी फेहरिस्त में वेदांता का नाम है या नहीं। लेकिन इतना तो शक होता ही है कि अगर यहां एक कैंसर अस्पताल है, तो पास में ही कहीं बॉक्साइट का कोई पहाड़ भी होगा।
हम कांकेर से गुजरते हैं, जो अपने जंगल युद्धकौशल और प्रति उग्रवाद प्रशिक्षण कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसे ब्रिगेडियर बीके पंवार चलाते हैं, जो इस युद्ध के एक और प्यादे के रूप में भ्रष्ट पुलिसवालों को जंगल कमांडो में तब्दील करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल का उद्देश पत्थरों पर रंगा हुआ है, ‘एक गुरिल्ला से लड़ने के लिए गुरिल्ला बनो।’
काफी देर हो चुकी थी। जगदलपुर सो चुका था, बस कुछेक होर्डिंगें जगमगा रही थीं जिनमें राहुल गांधी लोगों से यूथ कांग्रेस में आने का आह्वान करते दिख रहे थे। हाल के कुछ महीनों में वह दो बार बस्तर जा चुके हैं, लेकिन युद्ध के बारे में शायद उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा है। जनता के इस राजकुमार के लिए इस मसले पर कुछ भी कहना उसे मुश्किल में डाल सकता है। शायद उनके मीडिया प्रबंधकों ने ही उन्हें ऐसा करने से रोका होगा। राहुल गांधी का प्रचार अभियान इतनी सतर्कता से चलाया जा रहा है कि बलात्कार, हत्याओं, गांवों को जलाने और हजारों लोगों को उनके घरों से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार सरकार प्रायोजित सेना सलवा जुड़ुम के कर्ताधर्ता कांग्रेसी विधायक महेंद्र कर्मा का नाम बीच में कहीं नहीं आ पाता।
मां दंतेश्वरी के मंदिर पर मैं समय से पहले ही पहुंच चुकी थी। मुझे नहीं पता था कि मुझे यहां क्या कहना है। उसने बताया कि उसका नाम मंगतू है। जल्द ही मैं जान गयी कि जिस दंडकारण्य में मैं प्रवेश करने जा रही थी, वह ऐसे लोगों से अटा पड़ा था, जिनके कई नाम थे और जिनकी पहचान अस्पष्ट थी। यह विचार मेरे लिए राहत से कम नहीं था कि कुछ देर के लिए दूसरा बन जाना और अपनी पहचान से अलग होना कितना खूबसूरत होता होगा।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक बस स्टैंड था। हम वहां पैदल पहुंचे। वहां पहले से ही काफी भीड़ थी। काफी तेजी से यहां चीजें बदलीं। बाइक पर दो व्यक्ति थे। कोई संवाद नहीं – बस आंखों में ही नमस्ते बंदगी हुई, हमने बाइक पर अपना वजन संभाला और चल दिये। मुझे कोई आइडिया नहीं था कि हम कहां जा रहे थे। रास्ते में पुलिस अधीक्षक का आवास पड़ा। मैं पिछली बार के अपने दौरे में इधर आयी थी, सो मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्पष्टवादी व्यक्ति था। उसने कहा था, ‘देखिए मैडम, साफ-साफ कहूं तो यह समस्या पुलिस या सेना से हल नहीं होने वाली। इन आदिवासियों की दिक्कत यह है कि वे लालच नाम की चीज नहीं समझते। जब तक वे लालच को नहीं समझेंगे और खुद लालची नहीं बनेंगे, हमारे लिए कोई भी उम्मीद करना बेकार है। मैंने अपने अधिकारी से कहा है कि सुरक्षा बलों को हटा कर उसकी जगह हर घर में एक टीवी लगवा दीजिए। सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।’
कुछ ही देर में हम चौड़े पाट वाली एक नदी के रेतीले किनारों पर पहुंच गये। यह बरसाती नदी थी। इसलिए अभी वह बची नहीं थी। चारों ओर रेत के बीच एक पतली सी धारा थी जिसमें टखने भर पानी था और उसे पार करना काफी आसान था। उस पार था ‘पाकिस्तान’। उस एसपी ने मुझसे कहा था, ‘मैडम, हमारे सिपाही उधर लोगों को जान से मार देते हैं।’ मुझे याद है कि हम जैसे ही उस पार जाने लगे, एक पुलिसवाले की राइफल का निशाना हमारी ओर ही था। इतने खुले में उन्हें पहचान पाना मुश्किल नहीं था। मंगतू को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी उसी के पीछे हो ली।
उस पार हमारा इंतजार कर रहा था चंदू, जिसकी हलकी हरी शर्ट पर लिखा था हॉर्लिक्स! ‘आंतरिक सुरक्षा का यह खतरा’ कुछ उम्रदराज था। उसकी मुस्कराहट काफी प्यारी थी। उसके पास एक साइकिल थी, एक जेरी कैन जिसमें उबला पानी और मेरे लिए कई पैकेट ग्लूकोज के बिस्कुट, जो पार्टी ने भिजवाये थे। हमने अपनी सांस थाम कर चलना शुरू किया। उसकी साइकिल हमारा ध्यान बंटा रही थी। हालांकि रास्ता ऐसा था जिस पर साइकिल चलाना संभव नहीं था। पहाड़ों और पथरीले रास्तों पर चढ़ते-उतरते हम चलते गये। जब साइकिल चलाना मुश्किल हो जाता, तो चंदू उसे अपने सिर पर ऐसे उठा लेता जैसे कि उसका कोई वजन ही न हो। सूरज ढलते ही उनके कंधों पर लटके बैग बांग देने लगे। उनमें मुर्गे भरे थे जिन्हें बेचने वे बाजार ले गये थे, लेकिन बेच नहीं पाये थे।
अब कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी थीं। मैं कह नहीं सकती कि वे कितनी दूर थे। अब रास्ता मैदानी हो रहा था। मैंने नजरें चुरा कर आकाश की ओर देखा। खुला आकाश मुझे मदहोश करता है। मुझे उम्मीद थी कि हमारी मंजिल जल्द ही आने वाली है। चंदू ने कहा, हां। जल्दी यानी एक घंटे से भी ज्यादा। अब मुझे ढेर सारे पेड़ों की कतारें नजर आने लगी थीं। हम पहुंच चुके थे।
गांव काफी बड़ा था और मकान एक-दूसरे से काफी दूर बने थे। हम जिस घर में गये, वह काफी खूबसूरत था। आग जल रही थी, जिसके चारों ओर लोग बैठे थे। बाहर अंधेरे में उससे भी ज्यादा लोग थे। पता नहीं, कितने। उन्होंने अभिवादन किया, कॉमरेड लाल सलाम। मैंने भी जवाब दिया, लाल सलाम। मैं थक कर चूर हो चुकी थी। उस घर की महिला ने मुझे भीतर बुलाया। उसने मुझे खाने को रेड राइस के साथ हरी फलियों में पकी हुई चिकेन करी दी। जबर्दस्त खाना। उसकी बच्ची मेरे पास में ही सोयी हुई थी और उसके चांदी के कड़े धधकती हुई आग में चमक रहे थे।
हम सवेरे पांच बजे उठ गये। छह बजे तक हम निकल पड़े। एकाध घंटे के बाद एक और नदी हमने पार की। रास्ते में कुछ खूबसूरत गांव पड़े। हर गांव पर इमली के पेड़ों की छाया थी। इतने विशाल और विनम्र जैसे कि उन गांवों पर झुका हुआ कोई ईश्वर हो। यह थी बस्तर की मीठी इमली। ग्यारह बजते-बजते सूरज चढ़ चुका था। अब चलना सज़ा हो रहा था। दोपहर के खाने के लिए हम एक गांव में रुकते हैं। करीब दो बजे हम फिर से चल पड़ते हैं। इस गांव में हम दीदी से मिलने जा रहे हैं। दीदी यानी बहन कॉमरेड, जो हमें बताएंगी कि आगे क्या करना है। चंदू को नहीं पता कि आगे का सफर कैसा होगा। यहां सूचनाओं के भी स्तर होते हैं। हर व्यक्ति को हर चीज जानना जरूरी नहीं होता। जब हम वहां पहुंचते हैं, तो दीदी नहीं मिलती। उसकी कोई खबर नहीं है। पहली बार मैं देखती हूं कि चंदू के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। मैं और भी चिंतित हो जाती हूं। मैं नहीं जानती कि लोग यहां एक-दूसरे से कैसे संपर्क करते हैं, अगर कुछ गड़बड़ हुई तो फिर क्या?
हम एक पुराने स्कूल के बाहर डेरा डालते हैं। यह गांव से कुछ दूर है। आखिर गांवों के सारे सरकारी स्कूल कंक्रीट के क्यों होते हैं, जिनमें खिड़कियां स्टील शटर की तरह और दरवाजे भी स्टील के होते हैं, स्लाइड करने वाले? इन्हें भी गांव के घरों जैसा मिट्टी और फूस से क्यों नहीं बनाया जाता? ताकि इनका इस्तेमाल बैरक और बंकर की तरह भी हो सके। चंदू बताता है, ‘अबूझमाड़ के गांवों में स्कूल ऐसे ही होते हैं…’। एक लकड़ी से वह जमीन पर स्कूल के भवन का नक्शा खींचता है – एक दूसरे से जुड़ी तीन अष्टकोणीय आकृतियां – बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते की तरह। वह बताता है, ‘ताकि वे यहां से हर दिशा में गोली चला सकें।’ अपनी बात को समझाने के लिए वह बिल्कुल क्रिकेट के ग्राफिक की तरह तीर बनाता है। इन स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं। चंदू बताता है कि वे सभी भाग गये। मैंने पूछा, ‘कहीं तुम लोगों ने तो उन्हें नहीं खदेड़ दिया?’ ‘न, हम सिर्फ पुलिस को खदेड़ते हैं।’ वह पूछता है, ‘जब शिक्षकों को घर बैठे ही तनख्वाह मिल जाती है, तो वे यहां आने की जहमत क्यों उठाएंगे?’ बात तो सही है!
वह बताता है कि यह हमारा ‘नया इलाका’ है। पार्टी हाल ही में यहां आयी है।
तब तक करीब 20 युवा लड़के और लड़कियां आ जाते हैं। सभी किशोरवय के या 20 से 30 के बीच में हैं। चंदू बताता है कि यह गांव की मिलिशिया है। माओवादी सैन्य क्रम की सबसे निचली कतार। मैंने पहले कभी ऐसी कोई सेना नहीं देखी। ये साड़ी और लुंगी में हैं, कुछ हरे रंग के कपड़े पहने हैं। सभी के पास भरमार है यानी मजल लोडिंग राइफल। कुछ के पास चाकू, कुल्हाड़ी, तीर-कमान भी है। एक के पास जिंदा मोर्टार भी है, जिसे तीन फुट की जीआई पाइप से बनाया गया है। इसमें बारूद भरी है। यह चलने पर बहुत तेज आवाज करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। वे बताते हैं कि इसके बावजूद पुलिस इससे डरती है। ऐसा लगता नहीं कि इन लोगों के दिमाग में युद्ध के बारे में ख्यालात चलते होंगे, शायद इसलिए कि यह इलाका सलवा जुड़ुम के दायरे से बाहर है। इन्होंने दिन भर का काम पूरा कर लिया है। वे कुछ घरों के चारों ओर बाड़ लगा रहे थे ताकि खेतों में बकरियों को घुसने से रोका जा सके। इनमें काफी उत्सुकता और उत्साह है। लड़कियां यहां लड़कों के साथ काफी सहज और आत्मविश्वास में दिखती हैं और इन चीजों को पकड़ने में मैं बहुत तेज हूं। मुझे यह देखकर अच्छा लगता है। चंदू बताता है कि इनका काम गश्त लगाना है और चार-पांच गांवों की सुरक्षा करना है, खेतों की रक्षा करना है, उनके घरों की मरम्मत करना और कुओं को साफ करना है – यानी जो भी जरूरत पड़े उसे पूरा करना है।
दीदी अब तक नहीं आयी। अब क्या किया जाए? कुछ नहीं। इंतजार कीजिए और तब तक सब्जियां काटने और छीलने में मदद कीजिए।
रात के खाने के बाद सभी कतार में चल देते हैं। हम सब कुछ साथ लेकर बढ़ते हैं – चावल, सब्जियां, हांडी और बरतन। हम स्कूल परिसर को छोड़ चुके हैं। आधे घंटे से भी कम समय में हम एक सुरक्षित छांव में पहुंच जाते हैं। यहां हमें सोना है। निस्तब्ध शांति है। मिनट भर के भीतर हर कोई अपनी झिल्ली (नीली प्लास्टिक की चादर, जिसके बगैर क्रांति संभव नहीं) बिछा चुका है। चंदू और मंगतू एक में ही काम चला लेते हैं और मुझे एक अलग झिल्ली दी जाती है। मेरे लिए सबसे अच्छी जगह वे खोज निकालते हैं सोने के लिए, एक पत्थर के किनारे। चंदू ने दीदी को संदेश भेज दिया है। यदि उसे वह मिल गया, तो सवेरे वह यहां आ जाएगी। बशर्ते संदेश उस तक पहुंचे।
अब तक मैं जितने कमरों में सोयी हूं, यह सबसे खूबसूरत कमरा है। हजार स्टार वाले होटल में मेरा निजी सुइट। और मैं घिरी हूं इन अद्भुत, खूबसूरत बच्चों से, जिनके हाथों में हथियार हैं। ये सभी निश्चित तौर पर माओवादी ही हैं। तो क्या ये मरने जा रहे हैं? क्या जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल इन्हीं को मारने के लिए बनाया गया है? ये सारे हेलीकॉप्टर गनशिप, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर क्या इन्हीं के लिए हैं?
सब सो चुके हैं, सिवाय इन संतरियों के, जो डेढ़ घंटे की पाली में सोते हैं। मेरी नजर तारों पर जाती है। जब मैं बच्ची थी, तो मीनाचल नदी के किनारे सूरज ढलते ही शुरू होने वाली झींगुरों की आवाज को मैं तारों की पुकार समझती थी, जैसे वे टिमटिमाने की तैयारी कर रहे हों। मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि आखिर इस जगह से मुझे कितना प्यार हो गया है। दुनिया में इससे प्यारी और कोई जगह शायद नहीं होगी, जहां मैं होना चाहूंगी। आज रात मुझे क्या होना चाहिए? तारों की चादर के नीचे, कामरेड राहेल? खैर, दीदी कल आ जाएंगी।
वे दोपहर से पहले आ पहुंचे। कुछ दूरी पर मैं उन्हें देख पा रही हूं। करीब 15 थे, सभी हरी वर्दी में, हमारी ओर दौड़ कर आते हुए। जिस तरह से वे दौड़ रहे थे, मैं उन्हें देख कर समझ सकती थी कि वे मजबूत लोग हैं। जनमुक्ति गुरिल्ला सेना के लोग। वही, जिनके लिए थर्मल इमेजिंग और लेजर निर्देशित रायफलें हैं, जिनके लिए जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल बनाया गया है।
कैंप तक पहुंचने में कुछ घंटे और लगेंगे। पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका है। यहां संतरियों और गश्ती सैनिकों के कई स्तर हैं। शायद दो कतारों में करीब सौ कामरेड होंगे। सभी के पास हथियार हैं। और चेहरों पर मुस्कान। वे गाना शुरू करते हैं, ‘लाल लाल सलाम, लाल लाल सलाम, आने वाले साथियों को लाल लाल सलाम।’ वे काफी मीठा गाते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी नदी या महकते हुए जंगल पर यह कोई लोकगीत हो। गीत के साथ अभिवादन, हाथ मिलाना और बंधी मुट्ठियां। सभी एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए कहते हैं – लाल सलाम, लाल सलाम।
कैंप के नाम पर यहां 15 वर्ग फुट में बिछी हुई नीली झिल्ली के अलावा कुछ नहीं दिखता। छत भी झिल्ली की ही है। रात में मेरा कमरा यही होगा। शायद इतने दिनों तक पैदल चलने के बदले यह मेरा पुरस्कार था, या फिर आगे जो पड़ने वाला है, उसके बदले मुझे बहलाया जा रहा था। हो सकता है दोनों ही बातें रही हों। खैर, शायद इस सफर में यह आखिरी रात थी जब मेरे सिर पर छत थी। रात के खाने पर मुझे मिलती हैं कॉमरेड नर्मदा – क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन की प्रमुख (इनके सिर पर ईनाम है)। पीएलजीए की कॉमरेड सरोजा जो अपनी एसएलआर जितनी ही लंबी हैं। कॉमरेड मासे (गोंडी भाषा में इसका अर्थ होता है काली लड़की), जिनके सिर पर भी ईनाम घोषित है। तकनीक पारंगत कॉमरेड रूपी। कॉमरेड राजू, जो उस डिवीजन के प्रमुख हैं, जिसमें हम लोग चल रहे थे। और कॉमरेड वेणु (या कॉमरेड मुरली, सोनू, सुशील – आप उन्हें जो कहना चाहें), जो सबसे वरिष्ठ हैं। हो सकता है केंद्रीय कमेटी में हों, पोलित ब्यूरो में भी हो सकते हैं। मुझे बताया नहीं जाता। मैं पूछती भी नहीं। हमारे बीच में गोंडी, हलबी, तेलुगु, पंजाबी और मलयालम में बात हो रही है। सिर्फ मासे अंग्रेजी बोलती है। (इसीलिए हम तय करते हैं कि हम हिंदी में ही बात करेंगे)। कॉमरेड मासे लंबी है, शांत है और ऐसा लगता है कि संवाद में शामिल होने में उसे काफी दिक्कत हो रही हो। लेकिन जिस तरह से उसने मुझे गले लगाया, मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि वह आदमी को पहचानना जानती है। जंगल में किताबें न मिलना उसे बहुत अखरता है। जब उसे मुझ पर पूरा भरोसा हो जाएगा, शायद तब वह मुझे अपनी पूरी कहानी बताएगी।
जैसा कि इस जंगल में अक्‍सर होता है, बुरी खबर अचानक आयी। एक दौड़ते हुए व्यक्ति के साथ। जिसके पास बिस्कुट थे और छोटे-छोटे मुड़े हुए कागज के टुकड़ों पर कुछ लिखा हुआ था। ये टुकड़े एक बैग में ऐसे भरे थे जैसे चिप्स हों। हर जगह की खबर। ओंगनार गांव में पुलिस ने पांच लोगों को मार दिया है। इनमें चार मिलिशिया के हैं और एक आम ग्रामीण। संथु पोट्टाई (25), फूलो वाड्डे (22), कांडे पोट्टाई (22), रामोली वाड्डे (20), दलसाई कोराम (22)। हो सकता है ये सभी वे बच्चे हों जो पिछली रात तारों से नहायी हमारी डॉर्मिटरी का हिस्सा थे। फिर अच्छी खबर आती है कुछ लोगों के झुंड के साथ, जिसमें एक मोटा युवक भी है। वह भी उन्हीं के कपड़ों में है, लेकिन वे नये हैं। सभी उसके कपड़ों की बड़ाई करते हैं कि वे कितने फिट हो रहे हैं। वह शर्माता भी है और खुश भी होता है। वह एक डॉक्टर है जो अभी-अभी जंगल में कॉमरेडों के साथ रह कर काम करने आया है। पिछली बार दंडकारण्य में जब कोई डॉक्टर आया था, तो इस बात को बरसों बीत गये।
मुझे कॉमरेड कमला से मिलवाया जाता है। मुझे हिदायत दी जाती है कि मैं उसे बिना साथ लिये अपनी झिल्ली से पांच फीट दूर भी न जाऊं। क्योंकि अंधेरे में कोई भी रास्ता भूल कर गुम हो सकता है। (मैं उसे जगाती ही नहीं, बिल्कुल लट्ठ की तरह पड़ी रहती हूं)। सुबह कमला मुझे पॉलीथिन का बना एक पीला पैकेट देती है, जिसका एक कोना फटा हुआ था। यह अबिस गोल्ड रिफाइंड सोया तेल का पैकेट था, जो अब शौच में मेरे मग के रूप में काम आने वाला था। क्रांति की राह में कुछ भी बरबाद नहीं जाता।
(अब भी कॉमरेड कमला के बारे में मैं लगातार, रोजाना सोचती रहती हूं। वह सतरह बरस की है। उसके पीछे एक देसी पिस्तौल लटकी रहती है। और उसकी मुस्कान तो गजब है। फिर भी अगर पुलिस से कभी सामना हो गया, तो वे उसे मार डालेंगे। वे पहले शायद उसकी इज्जत लूटेंगे। उससे कोई सवाल नहीं किया जाएगा। क्योंकि वह ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा’ है।)
दंडकारण्य को अंग्रेज गोंडवाना कहते थे, यानी गोंडो की धरती। आज इस जंगल से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाएं जुड़ती हैं। समस्याग्रस्त लोगों को अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बांटना तो पुरानी तरकीब है। लेकिन ये माओवादी और गोंड राजकीय सीमाओं जैसी चीजों पर बहुत ध्यान नहीं देते। उनके दिमाग में तो अलग नक्शा चल रहा होता है। और जंगल के जीवों की तरह उनके रास्ते भी अलग होते हैं। इनके लिए सड़कें चलने के लिए नहीं बनीं। वे तो सिर्फ पार करने के लिए हैं, और धीरे-धीरे ऐसा चलन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि वहां सेना तैनात होती है। कोया ओर दोरला जनजातियों में बंटे गोंड यहां बहुसंख्य हैं, हालांकि दूसरे आदिवासी समुदायों की भी यहां रिहाइश है। गैर-आदिवासी बसावट सिर्फ जंगलों के किनारे सड़कों और बाजारों के पास है।
पीडब्ल्यूजी के लोग दंडकारण्य में आने वाले पहले प्रचारक नहीं थे। प्रसिद्ध गांधीवादी बाबा आम्टे ने 1975 में वरोरा में कुष्ठ आश्रम और अस्पताल खोला था। अबूझमाड़ के सुदूर गांवों में रामकृष्ण मिशन ने ग्रामीण स्कूल खोलने शुरू किये थे। उत्तरी बस्तर में बाबा बिहारी दास ने ‘आदिवासियों को वापस हिंदू बनाने’ के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया था, जिसके तहत आदिवासी संस्कृति को नष्ट कर उनमें हिंदू धर्म की सबसे बड़ी नेमत जाति को उनके भीतर प्रवेश कराया जाना था। शुरू में जिन्होंने धर्म बदला – गांवों के मुखिया और बड़े जमींदार – सलवा जुड़ुम के संस्थापक महेंद्र कर्मा जैसे लोग, उन्हें द्विज ब्राह्मण की उपाधि दी गयी। (जाहिर तौर पर यह एक घपला ही था, क्योंकि कोई भी ब्राह्मण नहीं बन सकता। ऐसा ही होता तो हम अब तक ब्राह्मणों के देश बन चुके होते)। लेकिन इस नकली हिंदूवाद को आदिवासियों के लिए पर्याप्त माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हर नकली चीज – बिस्कुट, साबुन, माचिस और तेल – जो गांवों के बाजारों में मिलती है। हिंदुत्व के इस अभियान ने भूमि रिकॉर्ड में गांवों के नामों को बदल दिया। अब इन गांवों के दो नाम हैं, एक जनता का दिया नाम और दूसरा सरकारी नाम। मसलन, इन्नार गांव को चिन्नारी बना दिया गया। मतदाता सूची में आदिवासियों के नाम बदल कर हिंदू नाम बना दिये गये। (मासा कर्मा बन गये महेंद्र कर्मा)। जिन्होंने हिंदू बनना स्वीकार नहीं किया, उन्हें ‘कटवा’ कह दिया गया (यानी अछूत), जो बाद में माओवादियों के स्वाभाविक समर्थक बन गये।
पीडब्ल्यूजी ने अपना काम सबसे पहले दक्षिणी बस्तर और गढ़चिरौली में शुरू किया। कॉमरेड वेणु उन शुरुआती महीनों के बारे में विस्तार से बताते हैं : कि गांव वाले कैसे उनसे भय खाते थे और अपने घरों में इन्हें घुसने नहीं देते। कोई उन्हें खाना-पानी नहीं देता। पुलिस ने अफवाह फैला दी थी कि वे चोर हैं। डर कर महिलाओं ने अपने जेवर लकड़ी के चूल्हे की राख में छुपा दिये। बड़े पैमाने पर इनका दमन किया गया। नवंबर 1980 में पुलिस ने गढ़चिरौली में एक गांव की सभा पर गोलीबारी की, जिसमें तकरीबन समूचा स्क्वाड ही मारा गया। यह दंडकारण्य की पहली ‘फर्जी मुठभेड़’ थी। यह बहुत बड़ा झटका था जिसके चलते कॉमरेड गोदावरी के उस पार अदीलाबाद लौट गये। लेकिन 1981 में वे फिर लौटे। उन्होंने इस बार आदिवासियों को तेंदू पत्ता के दाम बढ़ाने के मुद्दे पर संगठित करना शुरू किया। उस वक्त व्यापारी 50 पत्तों के एक बंडल का तीन पैसा देते थे। इस किस्म की राजनीति से बिल्कुल अनजान लोगों को इस मुद्दे पर संगठित कर के हड़ताल आयोजित करवाना अपने आप में एक बड़ा काम था। आखिरकार हड़ताल कामयाब हुई और मजदूरी को बढ़ा कर छह पैसे बंडल कर दिया गया। लेकिन पार्टी की असली कामयाबी एकता की ताकत का प्रदर्शन था कि कैसे राजनीतिक सौदेबाजी करने का यह एक नया तरीका हो सकता है। आज तमाम हड़तालों और प्रदर्शनों के सिलसिले के बाद एक बंडल की मजदूरी एक रुपया मिलती है। (मौजूदा दरों पर इसकी संभावना कम ही लगती है, लेकिन तेंदू पत्तों का कारोबार सैंकड़ों करोड़ रुपये का होता है)। हर सीजन में सरकार ठेके देती है और ठेकेदारों को एक निश्चित मात्रा में तेंदू पत्ता इकट्ठा करने की मंजूरी देती है – जो 1500 से 5000 मानक बोरे के बीच हो सकती है। हर मानक बोरे में करीब 1000 बंडल होते हैं (यह पता करने का कोई तरीका नहीं कि ठेकेदार इससे ज्यादा बंडल न निकालते हों)। बाजार में आते ही तेंदू पत्ता किलो में बिकने लगता है। बंडल को मानक बोरों और फिर किलो में बदलने वाले गणित पर पूरी तरह ठेकेदारों का नियंत्रण होता है और उनके पास इसमें हेर-फेर करने की पर्याप्त गुंजाइश रहती है। मामूली आकलन के हिसाब से भी एक ठेकेदार के पास हर मानक बोरे पर 1100 रुपये बचते हैं, वो भी पार्टी को हर बोरे पर 120 रुपये का कमीशन देने के बाद। इस हिसाब से एक छोटा ठेकेदार (1500 बोरे) एक सीजन में करीब 16 लाख रुपये बना लेता है और बड़ा ठेकेदार (5000 बोरे) कम से कम 55 लाख रुपये। वास्तविक राशि इसकी कई गुना हो सकती है। इस पूरे कारोबार में ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक’ लोगों को सिर्फ इतना मिल पाता है कि वे अगले सीजन तक जिंदा रह सकें।
अचानक इस बातचीत में सबकी हंसी से खलल पड़ता है। पीएलजीए का एक कॉमरेड निलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह रह-रह कर खुद को मार भी रहा था। वह पास आया तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चींटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चींटियां उसके पूरे शरीर पर रेंग गयी थीं और हाथ व गले में काट रही थीं। निलेश खुद भी हंस रहा था। कॉमरेड वेणु ने पूछा, ‘क्या आपने कभी चींटियों की चटनी खायी है?’ मैं लाल चीटियों से खूब वाकिफ हूं, केरल में बीते अपने बचपन से ही। उन्होंने मुझे काटा भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें चखा नहीं।
निलेश बीजापुर से है, जो सलवा जुड़ुम का केंद्र है। उसका छोटा भाई सलवा जुड़ुम में चला गया। उसे एसपीओ बना दिया गया है। वह अपनी मां के साथ बसागुड़ा कैंप में रहता है। उसके पिता ने साथ जाने से मना कर दिया। वह गांव में ही रुक गये। बाद में जब मुझे निलेश से बात करने का मौका मिला, तो मैंने पूछा कि उसका भाई सलवा जुड़ुम के साथ क्यों चला गया।
‘वह बहुत छोटा था। उसे लोगों को लूटने और घरों को जलाने का जब मौका मिला तो उसे बहुत मजा आने लगा। वह सनक गया। अब वह फंस चुका है। वह कभी गांव वापस नहीं आ सकता। उसे माफ नहीं किया जाएगा। और यह बात वह जानता है।’
हम इतिहास के अपने सबक पर लौट आये। कॉमरेड वेणु ने बताया कि पार्टी का अगला बड़ा संघर्ष बल्लारपुर पेपर मिल्स के खिलाफ था। सरकार ने थापर कंपनी को काफी रियायती दरों पर 1.5 लाख टन बांस निकालने का ठेका 45 साल के लिए दे दिया था (बॉक्साइट की तुलना में यह छोटा धंधा है, फिर भी इस इलाके में पर्याप्त है)। आदिवासियों को एक बंडल के लिए 10 पैसे मिल रहे थे – एक बंडल में बांस के 20 तने होते हैं (थापर इससे कितना मुनाफा कमा रहा था, यह बताने के लोभ में मैं नहीं पड़ना चाहती)। लंबे समय तक चले आंदोलन, हड़ताल, फिर पेपर मिल के अधिकारियों के साथ सबके सामने खुली बातचीत के बाद दाम को बढ़ा कर तीस पैसे कर दिया गया। आदिवासियों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने वादे तो किये थे, लेकिन पूरे करने के कोई संकेत नहीं दिये। इसके बाद लोग पीडब्ल्यूजी के पास उसमें शामिल होने के लिए आने लगे।
सात स्क्वाड की टीम ने काफी लंबा रास्ता अब तय कर लिया था। इसका प्रभाव अब 60,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र, हजारों गांवों और लाखों लोगों के बीच था।
लेकिन वन विभाग का खात्मा पुलिस के आने का सबब बन गया था। अब खून-खराबे का सिलसिला चल निकला। पुलिस की फर्जी मुठभेड़, पीडब्ल्यूजी का घेराव। जमीन के पुनर्वितरण के बाद दूसरी जिम्मेदारियां भी आ गयीं : सिंचाई, खेती की पैदावार और आबादी बढ़ने की समस्या, जिसके चलते जंगल भूमि साफ होती जा रही थी। इसके बाद ‘जन कार्रवाई’ और ‘सैन्य कार्रवाई’ को अलग करने का फैसला लिया गया।
लोहंडीगुड़ा, जहां महज पांच घंटे में गाड़ी चला कर दंतेवाड़ा से पहुंचा जा सकता है, कभी भी नक्सली इलाका नहीं था। लेकिन आज है। कॉमरेड जूरी उसी इलाके में काम करती है। मैं चींटियों की चटनी खा रही थी, तब वह मेरे बगल में ही बैठी थी। वह बताती है कि उन्होंने वहां तब जाने का फैसला किया, जब गांवों की दीवारों पर लोग रंगने लगे, नक्सली आओ, हमें बचाओ। कुछ ही महीने पहले ग्राम पंचायत अध्यक्ष विमल मेश्राम को सरे बाजार गोली मार दी गयी थी। जूरी कहती है, ‘वह टाटा का आदमी था। वह लोगों पर जमीन देकर मुआवजा लेने का जबरन दबाव बना रहा था। ठीक ही हुआ कि वह खत्म हो गया। हमारा भी एक कॉमरेड हालांकि चला गया। उन्होंने उसे गोली मार दी। आप और चपोली लेंगी?’ वह सिर्फ 20 बरस की है। ‘हम टाटा को वहां नहीं आने देंगे। लोग नहीं चाहते कि वे आएं।’ जूरी पीएलजीए की नहीं है। वह पार्टी की सांस्कृतिक इकाई चेतना नाट्य मंच में है। वह गाती है। गीत भी लिखती है। अबूझमाड़ की रहने वाली है। (उसने कॉमरेड माधव से ब्याह किया है। माधव जब मंच की टुकड़ी के साथ गाते हुए उसके गांव आये थे, तो उसे उनसे प्रेम हो गया था)।
मुझे लगा कि अब कुछ कहना चाहिए। हिंसा की व्यर्थता के बारे में, या फिर जान से मार देने के संक्षिप्त फैसलों पर। लेकिन मैं उन्हें क्या करने को कहती? कि वे अदालत में जाएं? या दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना करें? रैली निकालें? या फिर आमरण अनशन पर बैठ जाएं? अजीब हास्यास्पद बात होती। नयी आर्थिक नीति के प्रचारकों से – जिनके लिए यह कहना काफी आसान होता है कि ‘देयर इज नो आल्टरनेटिव’ – पूछा जाना चाहिए कि वे एक वैकल्पिक प्रतिरोध नीति भी सुझाएं। बिल्कुल इन लोगों के हिसाब से, जो इस जंगल के हिसाब से फिट बैठती हो। अभी, इसी वक्त। आखिर ये लोग किस पार्टी को वोट दें? इस देश की किस लोकतांत्रिक संस्था के पास ये गुहार लगाएं? आखिर ऐसा कौन सा दरवाजा बचा है, जो नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बड़े बांधों के खिलाफ अपने बरसों से चल रहे संघर्ष के दौरान न खटखटाया हो?
अब अंधेरा हो चुका था। कैंप में काफी चहल-पहल थी, लेकिन मैं कुछ नहीं देख पा रही थी। बस कुछ प्रकाश बिंदु हरकत करते से दिख रहे थे। कह पाना मुश्किल है कि वे तारे थे, पतंगे या फिर माओवादी। अचानक नन्हा मंगतू प्रकट होता है। मुझे पता चलता है कि वह यंग कम्युनिस्ट्स मोबाइल स्कूल की पहली पीढ़ी का सदस्य है, जिन्हें साम्यवाद के बुनियादी सिद्धांतों को पढ़ना, लिखना और समझना सिखाया जा रहा है (जिसको लेकर हमारा कॉरपोरेट मीडिया भौंकता रहता है, ‘युवा मस्तिष्कों का सैद्धांतीकरण’। जो टीवी विज्ञापन बच्चों के कुछ सोचने-समझने के काबिल होने से पहले ही उनका ब्रेनवॉश कर देते हैं, उसे सैद्धांतीकरण के रूप में नहीं देखा जाता)। किशोर कम्युनिस्टों को न तो बंदूक रखने दी जाती है और न ही वर्दी पहननी होती है। लेकिन वे पीएलजीए के दस्तों के साथ अपनी आंखों में तारों की चमक लिये बिल्कुल किसी रॉक बैंड की तरह चलते रहते हैं।
हमारे चलने से पहले कॉमरेड वेणु पास आते हैं, ‘तो ठीक है कॉमरेड, मैं इजाजत चाहूंगा।’ मुझे एकबारगी झटका लगता है। एक गर्म टोपी और चप्पलों में वह एक छोटे से कीड़े की भांति लग रहे थे, अपने तीन महिला और तीन पुरुष गार्डों से घिरे हुए। सभी हथियारों से लैस थे। उन्होंने कहा, ‘कॉमरेड हम आपके बहुत आभारी हैं कि आप इतनी दूर से यहां तक आयीं।’ एक बार फिर हम हाथ मिलाते हैं और भिंची मुट्ठियां लहराती हैं, ‘कॉमरेड, लाल सलाम।’ वह जंगलों में कहीं गुम हो जाते हैं। उनके पास इन जंगलों की चाबी है। एक पल में ऐसा लगता है कि जैसे वे यहां कभी थे ही नहीं। मैं कुछ देर के लिए असहाय सी हो गयी थी, लेकिन मेरे पास सुनने के लिए उनकी घंटों की रिकॉर्डिंग है। और जैसे-जैसे ये दिन हफ्तों में बदलते जाएंगे, मैं ऐसे तमाम लोगों से मिलूंगी जो उस खांचे में रंग और शब्द भरेंगे जो उन्होंने मेरे लिए बनाया है। अब हम उल्टी दिशा में चलने लगे। कॉमरेड राजू, जिनके शरीर से एक मील दूर से ही आयोडेक्स महक रहा था, मुस्कुरा कर कहते हैं, ‘मेरे घुटने तो गये। अब तो मैं मुट्ठी भर पेनकिलर लेकर ही चल पाऊंगा।’
कॉमरेड राजू बिल्कुल सही हिंदी बोलते हैं और मनोरंजक किस्से एकदम मारक तरीके से सुनाते हैं। वे रायपुर में 18 साल तक वकालत कर चुके हैं। वह और उनकी पत्नी दोनों ही पार्टी में थे और पार्टी के शहरी नेटवर्क का हिस्सा थे। 2007 के अंत में रायपुर नेटवर्क का एक अहम व्यक्ति गिरफ्तार हो गया, उसे प्रताड़ित किया गया और अंत में मुखबिर बना दिया गया। उसे पुलिस ने एक बंद वाहन में बैठाकर रायपुर का चक्कर लगवाया और पुराने साथियों की निशानदेही करने को कहा। कॉमरेड मालती इन्हीं में से एक थीं। 22 जनवरी 2008 को उन्हें कई अन्य के साथ गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने सलवा जुडुम में किये गये अत्याचार के वीडियो वाली सीडी कई सांसदों को भेजी थी। उनका मामला कभी-कभार ही सुनवाई के लिए आता है क्योंकि पुलिस जानती है कि मुकदमा कमजोर है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत पुलिस के पास उन्हें बगैर जमानत के बरसों तक अंदर रखने की छूट मिली हुई है। कॉमरेड राजू कहते हैं, ‘अब सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस की तमाम टुकड़ियां तैनात कर दी हैं ताकि बेचारे सांसदों की उन्हें भेजी गयी चिट्ठियों से सुरक्षा की जा सके।’ वह नहीं पकड़ा गया क्योंकि उस वक्त वह एक बैठक में दंडकारण्य आया हुआ था। तब से वह यहीं है। उसके दो छोटे बच्चे जो घर पर अकेले रह गये थे, पुलिस ने उनसे बहुत पूछताछ की। आखिरकार, ये बच्चे एक अंकल के साथ रहने चले गये और समूची गृहस्थी ही उठ गयी। कॉमरेड राजू को कुछ ही हफ्तों पहले पहली बार अपने बच्चों की खबर मिली। आखिर, उनके पास अपनी हंसी को बचाये रखने की ताकत और क्षमता कहां से आती है? जितना इन्होंने झेला है, उसके बाद भी ये क्यों लगातार आगे बढ़ पा रहे हैं? जाहिर है, पार्टी के लिए उनका प्यार, आस्था और एक उम्मीद इसके पीछे है। मेरा बार-बार तमाम निजी तरीकों से और कहीं ज्यादा गहराई में इस तथ्य से साक्षात्कार होता है।
अब हम सब एक साथ चल रहे हैं जहां मैं हूं और साथ हैं एक सौ ‘विवेकहीन रूप से हिंसक’ खून के प्यासे अतिवादी। कैंप छोड़ने से पहले मैंने एक नजर चारों ओर देखा था। एक भी निशान नहीं था इस बात का कि यहां करीब सौ लोगों ने डेरा डाला था, सिवाय राख के जहां आग जलायी गयी थी। मुझे इस सेना पर सहज भरोसा नहीं होता। जहां तक उपभोग का सवाल है, यह किसी भी गांधीवादी से ज्यादा गांधीवादी हैं और जलवायु परिवर्तन पर उपदेश देने वालों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन के मामले में सबसे आदर्श। लेकिन, फिलहाल तो विनाशकारी कामों में भी यह गांधीवादी रणनीति ही अपनाती है। मसलन, किसी पुलिस वाहन को जलाने से पहले उसके एक-एक हिस्से को तोड़ कर अलग कर लिया जाता है। स्टीयरिंग को सीधा करके भरमार बना ली जाती है, रेक्सीन को फाड़ कर हथियार रखने वाला पाउच और बैटरी को सोलर चार्जिंग में इस्तेमाल किया जाता है (अब हाईकमान से निर्देश आये हैं कि कब्जाये गये वाहनों को जलाया न जाए बल्कि दफना दिया जाए, ताकि जब जरूरत पड़े उन्हें दुरुस्त किया जा सके)।
अब हम घुप्प अंधेरे और मुर्दा शांति में चले जा रहे हैं। अकेली मैं हूं जो टॉर्च का इस्तेमाल कर रही हूं, वह भी नीचे की ओर ताकि हद से हद उसकी रोशनी में मुझे कॉमरेड कमला के पैर दिखते रह सकें और मैं जान सकूं कि मुझे कहां कदम रखना है। वह मुझसे 10 गुना ज्यादा वजन उठा रही है। अपना बैकपैक, राइफल, सिर पर रसद का एक भारी बैग, खाना पकाने वाला एक बर्तन और दोनों कंधों पर सब्जियों से भरे हुए झोले। उसके सिर पर रखा बैग जबरदस्त तरीके से संतुलित है और वह उन्हें बगैर हाथ लगाये ढलानों और फिसलनदार पथरीले रास्तों पर उतर सकती है। यह एक चमत्कार है। हम काफी लंबा चल चुके हैं। मैं इतिहास के अपने सबक की आभारी हूं क्योंकि उन तमाम चीजों के अलावा जो उससे मुझे मिलीं, कम से कम पूरे एक दिन मेरे पैरों को पूरा आराम मिला। जंगल में रात में पैदल चलना शायद सबसे खूबसूरत चीज है।
और अब मैं हर रात यही करने जा रही हूं।
नया दिन। नयी जगह। महुआ के विशाल पेड़ों तले उसिर गांव के बाहरी इलाके में हमने कैंप किया है। महुआ में अभी-अभी फूल आने शुरू हुए हैं और जंगल की छाती पर उसके मटमैले हरे ये फूल गहनों की तरह चू रहे हैं। हवा में इसकी मादकता घुली हुई है, जो सिर पर चढ़ रही है। हम भाटपाल स्कूल के बच्चों का इंतजार कर रहे हैं। ओंगनार की मुठभेड़ के बाद इसे बंद कर दिया गया था और अब यह पुलिस कैंप बन चुका है। बच्चों को घर भेज दिया गया। यही हाल नेलवाड़, मूंजमेट्टा, एडका, वेदोमकोट और धनोरा का है।
भाटपाल स्कूल के बच्चे नहीं आते।
मोस्ट वांटेड कॉमरेड नीति और कॉमरेड विनोद हमें एक लंबी सैर पर ले जाते हैं, जहां वे हमें स्थानीय जनताना सरकार द्वारा बनाये गये जल संग्रहण के ढांचे और सिंचाई तालाब दिखाते हैं। कॉमरेड नीति तमाम कृषि समस्याओं के बारे में बताती हैं। यहां सिर्फ दो फीसदी जमीन सिंचित है। दस साल पहले तक तो अबूझमाड़ में जुताई के बारे में सुना तक नहीं गया था। दूसरी ओर, गढ़चिरौली में संकर बीज और रासायनिक कीटनाशक तक घुस आये हैं।
कॉमरेड विनोद कहते हैं, ‘हमें अपने कृषि विभाग में तत्काल मदद की जरूरत है। हमें ऐसे लोग चाहिए जो बीज, जैविक खाद आदि के बारे में जानते हों। जरा सी मदद से हम बहुत कुछ कर ले जाएंगे।’
जनताना सरकार के इस इलाके के प्रमुख किसान हैं, कॉमरेड रामू। वह काफी गर्व से अपने खेत दिखाते हैं, जहां चावल, बैंगन, गोंगुरा, प्याज, कोलराबी उगाये गये हैं। इसके बाद उतने ही गर्व से वह हमें बहुत विशाल, लेकिन पूरी तरह सूखा हुआ एक सिंचाई तालाब दिखाते हैं। ये क्या है? ‘इसमें बरसात में भी पानी नहीं होता। दरअसल, यह गलत जगह खोदा गया है।’ यह कहते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, ‘यह हमारा नहीं है, इसे लूटी सरकार ने खोदा है।’ यहां दो समानांतर सरकारें हैं। जनताना सरकार और लूटी सरकार यानी लुटेरों की सरकार। मुझे कॉमरेड वेणु याद आते हैं : वे हमें सिर्फ इसलिए नहीं कुचलना चाहते कि उन्हें खनिज चाहिए, बल्कि इसलिए कि हम दुनिया को एक वैकल्पिक मॉडल दे रहे हैं।
हालांकि अब तक यह कायदे से विकल्प नहीं बन सका है – बंदूक के साथ ग्राम स्वराज का विचार। यहां जबरदस्त भुखमरी है, ढेरों बीमारियां हैं। इसके बावजूद इसने विकल्प की संभावनाएं तो पैदा की ही हैं। पूरी दुनिया के लिए नहीं, न अलास्का के लिए, न ही नयी दिल्ली के लिए और शायद समूचे छत्तीसगढ़ के लिए भी नहीं – सिर्फ अपने लिए। दंडकारण्य के लिए। और यह दुनिया का सबसे गूढ़ और गोपनीय रहस्य है। इसने अपने विनाश के एक विकल्प की नींव रखी है। इसने इतिहास को झुठलाया है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद इसने अपने वजूद का एक खाका तैयार कर ही लिया। और आज इसे जरूरत है सहयोग की। इस जगह को डॉक्टर चाहिए, शिक्षक चाहिए, किसान चाहिए।
यहां युद्ध नहीं चाहिए।
लेकिन अगर इसे इन सबकी जगह सिर्फ युद्ध मिलता है, तो यह पलट कर मारेगा।
अगले कुछ दिनों के दौरान मेरी मुलाकात केएएमएस के नेताओं से होती है। जनताना सरकार के कई पदाधिकारी, दंडकारण्य आदिवासी किसान-मजदूर संगठन के सदस्यों समेत मैं मारे गये लोगों के परिवारों से भी मिलती हूं। और उन आम लोगों से भी, जो इतने भीषण समय में जीवन को संभालने की जद्दोजहद में लगे हैं।
इस शांत से दिखने वाले जंगल में जीवन का पूरी तरह सैन्यकरण हो चुका है। लोगों को कॉर्डन एंड सर्च, फायरिंग, एडवांस, रिट्रीट, एक्शन जैसे शब्द आते हैं। अपनी फसले काटने के लिए उन्हें पीएलजीए की जरूरत पड़ती है ताकि उसका संतरी गश्त दे सके। बाजार तक जाना तो एक फौजी कार्रवाई जैसा है। सारे बाजार मुखबिरों से भरे हुए हैं जिन्हें पुलिस ने पैसा देकर खरीद लिया है। मुझे बताया जाता है कि नारायणपुर में तो एक ‘मुखबिर मोहल्ला’ ही है, जहां कम से कम 4000 मुखबिर रहते हैं। आदमी तो खैर अब बाजार जा ही नहीं पाते। महिलाएं जाती हैं, लेकिन उन पर कड़ी नजर रहती है। वे जरा सा भी ज्यादा खरीदारी कर लें, तो पुलिस तुरंत आरोप लगाती है कि वे नक्सलियों के लिए खरीद रही हैं। दवा की दुकानों को साफ निर्देश है कि लोगों को बेहद कम मात्रा में दवाइयां दी जाएं। जन वितरण प्रणाली के तहत राशन की चीनी, चावल और मिट्टी का तेल पुलिस स्टेशनों के आसपास या उनके भीतर भंडारित किया जाता है, जिससे उसे खरीदना लोगों के लिए तकरीबन असंभव होता है।
आखिरी रात हम एक खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ के नीचे रुके। सवेरे हमें इसे पार कर सड़क पर निकलना था, जहां से एक मोटरसाइकिल मुझे ले जाएगी। पहली बार जब मैं इस जंगल में घुसी थी, तब से लेकर अब तक यह जंगल बदल चुका है। अब चिरौंजी, कपास और आम में बौर आने लगे हैं।
कुडुर गांव के लोगों ने हमारे लिए कैंप में ताजा पकड़ी हुई मछली से भरा एक बड़ा सा मटका भिजवाया है। और साथ में मेरे लिए उन 71 किस्म के फलों, सब्जियों, दालों और कीड़ों के नामों और उनके बाजार दाम की एक सूची भी, जो उन्हें जंगल में मिलते हैं या जिन्हें वे उगाते हैं। यह सिर्फ एक सूची है, लेकिन यह एक दुनिया का नक्शा भी है।
हम जंगल पोस्ट तक पहुंचते हैं। फिर से दो बिस्कुट! कॉमरेड नर्मदा की ओर से एक कविता और एक पिचका हुआ फूल मुझे भेंट किया जाता है! और एक प्यारा-सा खत मासे की ओर से (कौन है वह? क्या मैं कभी जान पाऊंगी?)।
कॉमरेड सुखदेव पूछते हैं कि क्या वह मेरे आइपॉड में से एक गीत अपने कंप्‍यूटर में डाल सकते हैं। हम सुनते हैं, फैज अहमद फैज का लिखा शेर, इकबाल बानो की आवाज में, जो उन्होंने जिया-उल-हक की जुल्मतों के चरम दौर में लाहौर के एक मशहूर कंसर्ट में गाया था -
जब अहल-ए-सफ़ा-मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाये जाएंगे सब ताज उछाले जाएंगे सब तख्त गिराये जाएंगे हम देखेंगे।
पाकिस्तान में इस गीत को सुनने वाले पचास हजार श्रोताओं के मुंह से इसके बाद बस एक ही आवाज निकली थी : इंकलाब जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!
इतने सालों बाद यही नारा इस जंगल में गूंज रहा है। अजीब बात है। रिश्ते भी कैसे-कैसे बन जाते हैं।
(यह लेख आउटलुक अंग्रेजी में छपे अरुंधति रॉय के लेख वॉकिंग विद द कॉमरेड्स का संपादित और अनूदित अंश है। इसका अनुवाद युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है।)

Friday, June 25, 2010

फुटबाल उद्योग में बाल मजदूरी

11 जून को अफ्रीका के जोहान्सवर्ग शहर में फीफा विश्व कप का भव्य आयोजन हुआ। इसी दिन 140 देशों के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, टे्रडयूनियनों और कई अन्य संगठनों ने बाल मजदूरी के खिलाफ अपने-अपने देशों में प्रदर्शन किया। ऐसे प्रयासों के बावजूद फुटबाल उद्योग मे बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी का चलन जारी है। फुटबाल उद्योग में बाल मजदूरी के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करती देवेन्द्र प्रताप की रिपोर्ट
भारत में बच्चों से काम लेना साधारण सी बात मानी जाती है। लेकिन समाज में शिक्षा बढऩे के साथ ही लोगों की सोच में भी बदलाव आया है। पाकिस्तान के बंधुआ मजदूरों के ऊपर 1995 की एक रिपोर्ट ने वहां के फुटबाल उद्योग में बड़े पैमाने पर बाल मजदूरों और बंधुआ मजदूरों के इस्तेमाल का खुलासा किया था। यह पहली रिपोर्ट थी जिसनें खेलों की रंग-विरंगी दुनिया के पर्दे के पीछे की वीभत्स तस्वीर को सामने कर दिया था। तथाकथित राष्ट्रवादियों के पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए यह एक बेहतरीन सामग्री थी और इसका वे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भी कर सकते थे क्योंकि इस खबर का अंतर्राष्ट्रीय महत्व था। बहरहाल उनकी इस खुशी को काफूर होते ज्यादा वक्त नहीं लगा क्योंकि उसके तुरन्त बाद ही फुटबाल उद्योग और खेल सामग्री के निर्यात के दूसरे सबसे बड़े बाजार भारत के ऊपर ही गाज गिर गयी। तभी से फुटबाल उद्योग में बाल श्रम के इस्तेमाल से सम्बन्धित यह मुद्दा समय-समय पर मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उठाया जाता रहा है। इतने प्रयासों के बाद भी इस उद्योग में बाल श्रम का अभी भी उपयोग जारी है।साउथ एशियन कोलिशन ऑन चाइल्ड सर्विटय़ूड (एसएसीसीएस) ऐसी पहली संस्था है जिसने 1997 में पहली बार भारतीय खेल सामाग्री निर्माण उद्योग में काम करने वाले बाल श्रमिकों की दुस्वार कठिनाइयों को पूरे जोर के साथ विश्व पटल पर रखा। एसएसीसीएस ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में बाल श्रमिकों का जो संख्या बतायी है वह उस समय ही लाखों में थी। एस ए सी सी एस की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 1998 में लगभग 10000 बच्चे जालंधर में कार्य करते थे। पहले, भारत में यह काम जालंधर और मेरठ में किया जाता था लेकिन आजकल गुडग़ांव में भी यह काम शुरू हो चुका है। भारत में खेल सामग्री उत्पादन में जालंधर पहले स्थान पर है जबकि उत्तर प्रदेश में मेरठ दूसरे स्थान पर। हरियाणा में गुडग़ांव तीसरे स्थान पर है।
बाल श्रमिकों का नारकीय जीवन
फुटबाल की सिलाई का कार्य बहुतायत रूप में घर पर ही किया जाता है। निर्माता कम्पनियां फुटबाल का पैनल अपनी फैक्ट्री में बनाती है और फिर उसे सब-कंाट्रैक्टर के माध्यम से लोगों के घरों पर काम करवाती हंै। इन मजदूरों में ज्यादातर बहुत गरीब परिवार के बच्चे होते हैं जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने को मजबूर होते हैं। यही बच्चे ठेकेदारों के शिकार बनते हैं। नीदर लैंड से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस मजदूरों में से 90 प्रतिशत लोग भारतीय समाज में अछूत समझे जाने वाले दलित तबके से ताल्लुक रखते हैं। फुटबाल उद्योग में लगे दलित मजदूर और उनके बच्चे बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी के सबसे बड़े शिकार हैं। 1998 में जब न्यूनतम दैनिक मजदूरी 63 रुपये थी तब एक बालिग मजदूर को 20 रुपये मिलते थे। आज भी वही हाल है। सामान्यत: एक बंधुआ मजदूर को न्यूनतम मजदूरी के बारे में पता ही नहीं होता है। भारतीय कानून के अनुसार मुख्य निर्मात कम्पनियों को मजदूरों के वेतन और अन्य सुविधाओं की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि इस बारे में न तो हमारे नीति निर्माताओं को चिन्ता है और न ही उन कम्पनियों को जिनके लिए ये बाल मजदूर अपना बचपना बर्बाद कर देते हैं। पांच साल से ही बच्चे इस काम में शामिल हो जाते हैं। इनमें से बहुत कम ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने कभी स्कूल कभी स्कूल भी देखा हातो है। यदि स्कूल गये भी तो वे उसे जारी नहीं रख पाते क्योंकि उनके घर की माली हालात उन्हें यह करने नहीं देती। मेरठ के फुटबाल उद्योग में पूरा समय काम करने वाले बच्चों में से 40-50 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जिनकी आयु 5 से 14 वर्ष के बीच है। पांच छ: वर्ष के बच्चे दस-दस घंटे काम करते हैं। उनके लिए यह न्यूनतम काम के घंटे होते हैं। सामान्यत: वह 11-12 घंटे लगातार काम करते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें बचपन में ही पीठ व जोड़ों के दर्द की शिकायत हो जाती है। 30 वर्ष के होते-होते उनकी आंख की रोशनी भी कम होने लगती है। और इस तरह वे किसी काम के नहीं रह जाते।
बालश्रम की रोकथाम का गोरखधंधा
फुटबाल निर्माण में बालश्रम रोकने के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल महासंघ (फीफा) के वर्ष 1996 के प्रसिद्ध समझौते, यूरोपीय संसद के 2007 के प्रस्ताव, भारतीय खेल सामग्री निर्माण उद्योग के संबंध में साफ निर्देशों और सभी सरकारी दावों के बावजूद फुटबाल निर्माण में न सिर्फ बाल श्रम बल्कि बंधुआ मजदूरी का चलन भी जारी है। इंटरनेशनल लेबर राइट्स फोरम के सहयोग से बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) द्वारा किए एक नए अध्ययन के अनुसार अभी भी 5,000 बच्चे फुटबाल सिलाई के साथ ही बेसबाल, क्रिकेट बाल, बास्केटबाल वॉलीबाल, टेनिस बाल और अन्य खेलों का सामान बनाने के काम में लगे हुए हैं। भारतीय खेल उद्योग कुल 318 तरह के खेल सामान बनाते हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर और पंजाब के जालंधर की झुग्गियों में ये बच्चे अपने परिवार द्वारा भारी कर्ज के चलते बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। इसका उनके स्वास्थ्य और शिक्षा पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।प्रसिद्ध बाल अधिकार कार्यकर्ता और बीबीए के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी द्वारा किए गए अध्ययन के ये निष्कर्ष ऑफ साइड चाइल्ड लेबर इन फुटबाल स्टीचिंग- ए केस स्टडी ऑफ मेरठ डिस्ट्रिक्ट शीर्षक से जारी किए गए हैं। सत्यार्थी ने इस अध्ययन में जिन पांच बच्चों को शामिल किया है वे अब बीबीए के अंतर्गत स्कूल में दाखिल हो चुके हैं। पर यह सवाल यह है कि जितने बड़े पैमाने पर इस उद्योग में बंधुआ मजदूरी का चलन है क्या उसके समाधान के लिए ये प्रयास नाकाफी नहीं हैं। कैलाश सत्यार्थी के अनुसार मेरठ के बाहरी इलाके बुद्धविहार और कमालपुर या नजदीकी गांव शिवाल खास में हजारों बच्चे कृत्रिम चमड़े से फुटबाल बनाने के काम में लगे हुए हैं। इन सामानों पर बाद में बालश्रम मुक्त का ठप्पा भी लगा दिया जाता है। बीबीए द्वारा वर्ष 1996 में पहली बार इस मामले को सामने लाने के बाद से फुटबाल सिलने में बच्चों के उपयोग में काफी अधिक कमी आई है। अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ताओं के दबाव और बीबीए और अन्य स्वंयसेवी संगठनों की गतिविधियों के कारण फुटबाल उद्योग में लगे बच्चों की संख्या 20,000 से घटकर अब 5,000 रह गई है।
बालश्रम से हो रही है देश की प्रगति!
भारत के फुटबाल उद्योग से न सिर्फ विदेशी कम्पनियां अकूत कमाई करती हैं वरन इससे भारत सरकार को भी करोड़ों फायदा होता है। 1998-1999 के बीच भारत ने 125.54 करोड़ रुपये की खेल सामग्री का व्यापार किया जबकि यही वर्ष 2000 में बढ़कर 7854. 76 लाख रूपए हो गया। भारत से बनी खोल सामग्री ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड अमेरिका आदि देशों को निर्यात होती है। यह कितना अजीब लगता है कि इतनी सम्पदा हमारे देश के नन्हें-नन्हें बच्चे पैदा करते हैं। बीबीए के अध्यन से यह स्पष्ट हो गया है कि इन बच्चों से 12-14 घंटे तक काम लिया जाता है। बच्चों के शरीरिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इनमें से 35 प्रतिशत बच्चों को चमड़ा सिलने की सुई के कटने से घाव हो जाता है। कई बार यह घाव पक कर नासूर बन जाता है। इसी तरह अन्य 35 प्रतिशत बच्चों को आंख में दर्द, 50 प्रतिशत को पीठ दर्द और 85 फीसदी बच्चों को हाथों और अंगुलियों में बराबर दर्द की शिकायत रहती है। हालत यह है कि ये बच्चे जिन कम्पनियों के लिए काम करते हैं वे बच्चों के दवा इलाज तक की व्यवस्था नहीं करतीं। बीबीए से जुड़े मनोज मिश्रा का कहना है कि बंधुआ और बाल मजदूरी से मुक्त कराए गए अब तक हजारों बच्चों ने मजिस्ट्रेट और श्रम निरीक्षकों के सामने बार-बार बयान दिया है कि उनसे कहीं दो वक्त के रुखे-सूखे भोजन पर कहीं तो कहीं नाममात्र की मजदूरी पर हर रोज 14 से 16 घंटे काम कराया जाता है। इसके बावजूद श्रम विभाग वर्षों के बाद भी क्यों चुप्पी साधे बैठा है ? श्रम मंत्री तक ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। उन्होंने यह भी कहा कि कारखानों का पंजीयन न होने से बाल श्रम कानून के तहत चालान होते ही कारखाना मालिक किराए के उस मकान को छोड़ कहीं अन्यत्र अड्डा जमा लेता है, जिससे अदालत में दायर सैकड़ों मुकद्में उसके लापता होने से अब तक खारिज हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि बचपन बचाओ आन्दोलन का उद्देश्य समस्या को अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के सामने सनसनी के रूप में पेश करना नहीं वरन उसके लिए प्रयास करना है। उन्होंने बताया कि बीबीए ने घरेलू उपभोक्ताओं के बीच भी यह अभियान शुरू किया है ताकि वे बालश्रम मुक्त खेल के सामान की मांग करें। जाहिर है यदि बीबीए अपने मकसद में कामयाब होता है तो निश्चित तौर पर यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
सम्पर्क: एक कदम आगे-हिन्दी पाक्षिक, से.-5, वसुन्धरा, गाजियाबाद, उ.प्र. :: फोन नं. 09911806746

Friday, June 18, 2010

अमेरिकी भूख के लिए जलता खाड़ी का तेल
देवेन्द्र प्रताप
जबकि दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था एक दूसरे के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ चुकी है ऐसे तेल संकट भी किसी देश विशेष के सन्दर्भ में कोई स्वतंत्र परिघटना नहीं रह गयी है। आज पूंजीवादी व्यवस्था का चरित्र पहले से कहीं ज्यादा वैश्विक हो गया है। दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था के एक दूसरे के साथ जुड़ाव ने उनके संकटों को भी साझा कर दिया है। 1930 की आर्थिक महामंदी के समय ऐसा सम्भव था कि कुछ देश महामंदी के प्रभाव से बच गये क्योंकि उस समय पूंजीवादी विकास का चरित्र इतना वैश्विक नहीं था। लेकिन आज यह बात सरासर गलत है। दरअसल, पंूजीवाद को फलते-फूलते रहने के लिए सतत मुनाफे के सो्रत के साथ ही उसका निवेश भी एक अनिवार्य शर्त है। इस शर्त को पूरा करने के लिए पूंजीवाद दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर और अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर दोहन करता है। पूंजीवाद की यही प्रवृत्ति एक तरफ उसका विस्तार भी करती है और दूसरी ओर उसे संतृप्तता की ओर भी ढकेलती है। आज अमेरिका पूरी दुनिया का चौधरी बन गया है। उसने विश्व के तेल के बाजार पर कब्जा करने के लिए अपनी पूरी मशीनरी को लगा रखा है। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति पेट्रोल खपत अमरीका में ही है। वहां पहले, 1973 के पहले तेल संकट के समय 33 प्रतिशत तेल बाहर से आता था। अब 60 प्रतिशत आता है और अनुमान है कि 2020 तक वह 70 प्रतिशत तेल आयात करने लगेगा। दुनिया के संसाधनों पर अपने कब्जे के लिए अमरीका आर्थिक, व्यापारिक, कूटनीतिक और सैनिक सभी तरीकों का इस्तेमाल करता है। अभी कुछ दिनों पहले अमेरिकी तेल कम्पनियों द्वारा वहां के तेल के बाजार पर कब्जा करने के लिए भ्रष्ट कजाक अधिकारियों को 8.4 करोड़ रूपये घूस में देने का मसला चर्चा में आया था। इराक और अमेरिका में लोकतंत्र के नाम पर अमेरिका द्वारा किया गया कत्लेआम आज किसी से छुपा नहीं है। सिर्फ अफगानिस्तान में ही करीब 2 लाख से ज्यादा बच्चे अमेरिकी लोकतंत्र बहाली के नाटक की भेंट चढ़ गये।दरअसल, पूंजीवादी मुनाफे की भूख ने सारी मर्यादाओं को तोड़कर गरीब देशों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के नए-नए तरीके निकाले हैं, उन्हीं से यह संकट पैदा हुआ है। तेल का मौजूदा संकट और सट्टेबाजी के बीच रिस्तातेल के बाजार को पूरी तरह से सट्टेबाजों के हवाले कर दिया गया है। इस खेल में बड़ी तेल कंपनियों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के साथ-साथ तेल के कारोबारी भी शामिल हैं। इसे अमेरिकी सरकार के साथ-साथ ओपेक का भी आशीर्वाद मिला हुआ है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की बड़ी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों से सांठ-गांठ किसी से छिपी नहीं है। अमेरिकी उपभोक्ताओं को भले ही पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ी हुई कीमतों की मार झेलनी पड़ रही हो लेकिन बुश प्रशासन तेल कंपनियों, बैंकों- वित्तीय संस्थाओं और सट्टेबाजी पर रोक लगाने के बजाय भारत और चीन जैसे देशों को तेल पर सब्सिडी खत्म करने की हिदायत देने में जुटा हुआ है। दरअसल आज उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार के साथ सट्टेबाजी इस हद तक गलबहिया हो गयी है कि उसकी सही तस्वीर के बारे मेें कुछ भी कह पाना मुश्किल है। बहरहाल तेल के मामले में इतना सभी जानते हैं कि तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के पीछे अमेरिकी सट्टेबाज कम्पनियों का ही हाथ होता है। हमारे देश के नेतृत्व को अमेरिका के सामने समर्पण करने के बजाय अपना निर्णय स्वतंत्र तौर पर लेना चाहिए। हमारे देश के नेतृत्व को इराक, इरान जैसे अन्य देशों के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने चाहिए। अगर हम ऐसा करते हैं तो हमारी अमेरिका के ऊपर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी। वैकल्पिक उर्जा का सवाल और अमेररिकी मंशा उर्जा के वैकल्पिक सो्रतों का इस्तेमाल कर बिजली उत्पादन समेत कई ऐसे बड़े काम किए जा सकते हैं जिससे मौजूदा ईंधन की समस्या और दिन ब दिन बढ़ती तेल कीमतों से काफी हद तक निपटा जा सकता है। ये ऊर्जा के पारंपरिक विकल्प के अलावा अलग से एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं। लेकिन अमेरिका क्यों चाहेगा कि खाड़ी का कोई मुल्क बाकी मुल्कों को ये वैकल्पिक ऊर्जा के नए रास्ते दिखाए। अगर ऐसा हो गया तो क्षेत्र में उनकी सदियों पुरानी दादागीरी का क्या होगा? इसके पीछे एक और वजह है। खाड़ी मुल्कों के तेल भंडारों में तकनीक पूरी तरह से पश्चिम की लगी है। लिहाजा ये देश काफी हद तक उसके कब्जे में है। परमाणु ऊर्जा की तकनीक पश्चिम से नहीं आई है। इसलिए इनका इस्तेमाल शुरू होने के बाद से इन देशों का दखल भी पूरे क्षेत्र में कम हो जाएगा। पश्चिम का दर्द इसलिए बढ़ता जाता है कि इसके विस्तार के साथ ही उन्हें अपना वर्षों से बनाया गया तेल साम्राज्य छिन्न-भिन्न होता नजर आने लगता है।बाजार पर कब्जा, वह भी किसी भी कीमत पर सारी दुनिया के ज्ञात प्राकृतिक तेल भंडारों का 60 प्रतिशत पश्चिम एशिया में मौजूद है; कि अकेले सउदी अरब में 20 प्रतिशत, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में मिलाकर 20 प्रतिशत, और इराक और ईरान में 10-10 प्रतिशत तेल भंडार हैं; कि ईरान के पास दुनिया की प्राकृतिक गैस का दूसरा सबसे बड़ा भंडार है; उसी तरह लगभग सारी दुनिया में अमेरिका के कारनामों से परिचित लोग इसे एक तथ्य की तरह स्वीकारते हैं कि अमेरिका की दिलचस्पी न लोकतंत्र में है और न ही किसी अन्य चीज में। उसकी दिलचस्पी सिर्फ अरब देशों के तेल के सो्रतों पर कब्जे में है। इसी मकसद को पूरा करने के लिए अमेरिका ने समूची दुनिया को युद्धक्षेत्र में तब्दील करने में लगा हुआ है। इरान से परमाणु हथियारों का खतरा तो अमेरिका का एक नाटक है दरअसल वह समूचे अरब क्षेत्र के तेल के भंडारों पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहता है। इसीलिए उसने अपने इन देशों में अपने सैन्य अड्डे खोल रखे हैं।पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सउदी अरब और इराक में अमेरिकी फौजों की मौजूदगी ईरान के लिए लगातार बढ़ते खतरे का संकेत है। अमेरिका व नाटो के सैनिकों की इराक में 1 लाख 40 हजार की मौजूदगी है, जॉर्डन और इजरायल में विश्वसनीय फौजी बेस है, अफगानिस्तान में 21000 फौजी और भेजे जा चुके हैं जबकि अमेरिका के फौजी जनरल द्वारा 40000 सैनिकों को और भेजने की माँग की गयी है। फौज और हथियारों के जमावड़े के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ पहले से ईरान के भीतर के और पड़ोसी देशों के साथ के अंतद्र्वद्वों को ईरान में अस्थिरता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं चूकेंगीं।
एक्सिस ऑफ इविल ?
अमेरिका ने शैतानियत की धुरी (एक्सिस ऑफ इविल) के तौर पर जिन देशों की पहचान की थी, उनमें से इराक को उसकी सारी बेगुनाही के सबूतों के बावजूद लाशों से पाट दिया गया। दूसरा है उत्तरी कोरिया, जिसने अमेरिकी मंशाओं को समझकर अपने आपको एक परमाणु ताकत बना लिया है। आकार और ताकत के मानकों से देखा जाए तो अमेरिका और उत्तरी कोरिया की तुलना शेर और बिल्ली के रूपक से की जा सकती है। लेकिन अब शेर को बिल्ली पर हाथ डालने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा क्योंकि अब बिल्लीके पंजों में परमाण्विक ताकत वाले नाखून आ गये हैं। उत्तरी कोरिया से निपटने की रणनीति का ही हिस्सा है कि पहले बड़े दुश्मन से निपट लिया जाए। और वो बड़ा दुश्मन है ईरान। यह सच है कि इराक को जमींदोज करने के बावजूद अमेरिका अभी तक अपने मंसूबों में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है, लेकिन ये सच्चाई भी अपनी जगह बहुत अहम है कि इराक पर जंग के बहाने से अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी को कई गुना बढ़ा लिया है। पश्चिम एशिया का मौजूदा सूरतेहाल ये है कि इजराएल, कुवैत, जॉर्डन और सउदी अरब में पहले से ही अमेरिका परस्त सरकारें मौजूद थीं, लेबनान के प्रतिरोध को अमेरिकी शह पर इजराएल ने बारूद के गुबारों से ढाँप दिया है और सीरिया, ओमान, जॉर्जिया, यमन, जैसे छोटे देशों की कोई परवाह अमेरिका को है नहीं। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के पानी में अमेरिकी नौसेना का पाँचवाँ बेड़ा डेरा डाले हुए है। कतर ने इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौर में अमेरिकी वायु सेना के लिए अपनी जमीन और आसमान मुहैया कराये ही थे। दरअसल इराक और फिलिस्तीन के भीतर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ व्यापक विद्रोह को कुचलने के बाद अब ईरान ही अहम देश है जहाँ से अमेरिकी वर्चस्ववाद के विरोध को जनता के साथ-साथ किसी हद तक राज्य का भी समर्थन हासिल है। इरान ने अपने ऊपर लगाए प्रतिबंधों को कूड़ेदान के हवाले कियातेहरान। ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने यूरेनियम संवर्धन के मसले पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंधों को मानने से इंकार कर दिया है। उन्होंने अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों को तमाचा जड़ते हुए कहा है कि इरान इन नए प्रतिबंधों को नहीं मानता। यह उसके परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाने जैसा है और उसने उन्हें कूड़ेदान में डाल दिया है। उधर, पश्चिमी देशों का कहना है कि परमाणु मुद्दे पर ईरान के साथ बातचीत के दरवाजे खुले हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बुधवार को अमेरिका द्वारा तैयार प्रस्ताव 12 मतों से स्वीकार कर लिया गया। लेबनान ने मतदान में भाग नहीं लिया जबकि ब्राजील और तुर्की ने मतदान का विरोध किया।
तेल उपभोग करने वाले देशों का
देश प्रतिशत
यूनाइटेड स्टेट्स 30
चीन 11
जापान 7.3
रूस 4.1
भारत 3.9
जर्मनी 3.6
ब्राजील 3.5
कनाडा 3.4
सउदी अरब 3.3
साउथ कोरिया 3.2
मेक्सिको 3.1
फ्रांस 2.8
युनाइटेड किंगडम 2.6
इटली 2.5
इरान 2.4
स्पेन 2.3
तेल उत्पादन करने वाले देशों का व्यौरा
देश प्रतिशत
सउदी अरब 12.1
रूस 11.6
यू एस ए 10.0
इरान 4.8
चीन 4.4
कनाडा 4.0
यूएई 3.5
वेनेजुएला 3.1
कुवैत 3.1
नार्वे 3.0
नाइजीरिया 2.8
ब्राजील 2.7
अल्जीरिया 2.6
इराक 2.5
अंगोला 2.3
लीबिया 2.2
युनाइटेड किंगडम 2.0
कजाकिस्तान 1.7
कतर 1.3
अजरबैजान 1.3